आ गये थे हम इस नयी
दुनिया मे कुछ अरमान ले कर
पता ना था ये गलिया
पहुचागी ह्मेकिस घर ||
चले जा रहे थे अकेले
इस भीड़ मे आगे बड़ कर
कुछ देर मे देखा रगिस्तान
ही है चारो एकड़ ||
फिर चल पड़े मुसाफिर
की तरह पानी की तालश मे हो कर बेफिकर
दूर से मृगतृष्णा का
अहसास हुआ तुम्हे देखकर
पास गये थे प्यास भुज
गई वो प्यारी सी मुस्कान देखकर ||
अब हम दोनो देखते है
इस दुनिया को कुछ अलग ही मोड़ पर
मगर ह्मे पता ना था
ये रगिस्तान के ख़तम होते मृगतृष्णा भी चली जयगी ह्मे अकेला छोड़ कर
Nice thought but u could use some editing.
ReplyDeletekya baat ha...subhanallah...
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